मंगलवार, 31 मई 2011

मंदिर जाने से पहले अपवित्र हो जाए तो क्या करें?


सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक दिनभर में हम कई कार्य करते हैं। ऐसे में कभी-कभी कुछ गलत कार्य भी हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार कई ऐसे कार्य बताए गए हैं, जिनसे हम अपवित्र हो जाते हैं। इस परिस्थिति में हम कोई धार्मिक कर्म, पूजा आदि नहीं कर सकते। यहां गलत कार्य का अर्थ यही है कि कुछ ऐसे कर्म जिनसे हमारा शरीर अपवित्र हो जाता है।

शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान से जुड़े किसी कर्म के लिए हमें पूर्णत: पवित्र होना चाहिए। यदि किसी भी प्रकार से हम अपवित्र हो जाते हैं तो पूजन आदि कर्म में शामिल होना वर्जित किया गया है। ऐसी अवस्था में किसी भी देवस्थान या मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए।

यदि जाने-अनजाने ऐसे कोई कार्य हमसे हो जाए तो हम अपवित्र हो जाते हैं, जैसे- यदि किसी अन्य व्यक्ति का थूक हम पर गिर जाए या भूलवश हम किसी अन्य व्यक्ति पर थूक दें, यदि कोई जानवर हमें जीभ लगा दे, किसी व्यक्ति को हमारा पैर लगने पर या अन्य व्यक्ति का पैर हमें लगने पर, अपवित्र वस्तु से छू जाने पर, छींकने पर आदि ऐसे कर्मों से हम पवित्र हो जाते हैं। साथ ही धर्म के अनुसार कुछ कार्य अधार्मिक बताए गए हैं, उनसे भी दूर रहना चाहिए। ऐसी अवस्था में पूजन आदि कार्य निषेध किए गए हैं।

शास्त्रों के अनुसार इन सभी दोषों से मुक्ति के लिए सूर्य का दर्शन करें। साथ ही अपने दाहिने कान को छुने से दोष समाप्त हो जाता है तथा पवित्रता प्राप्त होती है। किसी भी देवस्थान या मंदिर में प्रवेश से पूर्व अच्छे से हाथ-पैर, मुंह आदि धो लेना चाहिए। साथ ही भगवान से क्षमा याचना करनी चाहिए। रात के समय दाहिने कान को छू कर अपने इष्टदेव का स्मरण करें।

ये पेड़-पौधे बचाते हैं शनि के अशुभ प्रभाव से


1 जून 2011, बुधवार को शनि जयंती है। इस अवसर पर विशेष प्रयोग कर आप शनिदेव को प्रसन्न कर सकते हैं। कुछ विशेष पेड़-पौधों की जड़ों व माला धारण करने से शनि का बुरा प्रभाव कम होता है। नीचे ऐसे ही कुछ पेड़-पौधों की जानकारी दी गई है। इन उपायों को करने से आपके जीवन से शनि संबंधी परेशानियां समाप्त हो जाएंगी।

उपाय

- लाल चंदन की माला को अभिमंत्रित कर शनिवार या शनि जयंती के दिन पहनने से शनि के अशुभ प्रभाव कम हो जाते हैं।

- शमी वृक्ष की जड़ को विधि-विधान पूर्वक घर लेकर आएं। शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के दिन किसी योग्य विद्वान से अभिमंत्रित करवा कर काले धागे में बांधकर गले या बाजू में धारण करें। शनिदेव प्रसन्न होंगे तथा शनि के कारण जितनी भी समस्याएं हैं, उनका निदान होगा।

- काले धागे में बिच्छू घास की जड़ को अभिमंत्रित करवा कर शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी शनि संबंधी सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

- पीपल के पेड़ पर प्रतिदिन जल चढ़ाने और दीपक लगाने से भी शनिदेव प्रसन्न हो जाते हैं।


दैनिक भास्कर से साभार

ॐ के उच्चारण का रहस्य


ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है। अब आप ही सोचे इसे कैसे उच्चारित करें? ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।

आइंसटाइन भी यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है। आइंसटाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था। महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा।

ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।

तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।

साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।

*त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :
ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

*बीमारी दूर भगाएँ : तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।

सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।

*उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

*इसके लाभ : इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।

*शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :
प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।

- Shatayu

सोमवार, 21 मार्च 2011

वास्तु दोष दूर करेंगे नक्काशीदार बर्तन


भारतीय कला जहाँ एक ओर वैज्ञानिक और तकनीकी आधार रखती है, वहीं दूसरी ओर भाव एवं रस को सदैव जीवंत रखती है। आजकल घर के कामकाज में प्रयोग होने वाले बर्तनों पर अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नक्काशी की जाने लगी है।

इन कुछ खास बर्तनों में पीतल के बर्तन घर का वास्तुदोष दूर करेंगे। इन बर्तनों की नक्काशी इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इसके अलावा इनके आकार पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। साथ ही यह भी बताया जाता है कि घर के किस हिस्से में रखने पर वास्तुदोष कम होगा।

पीतल के बर्तन वैसे भी शुभ माने जाते हैं। पीतल के बड़े आकार के इन बर्तनों पर भगवान के सूक्ष्म रूप की नक्काशी की गई है जो काफी शुभ मानी जाती है। यह सूक्ष्म नक्काशी वास्तुदोष को दूर कर घर को सुख-समृद्धि से भर देती है। इन्हें घर की दीवारों और दरवाजों पर रखा जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से ये बर्तन इतने शुभ हैं कि लोग इनमें गेहूँ-चावल भरकर अपने घरों में रखते हैं। इससे घर में धन-धान्य की बरकत बनी रहती है। अधिकतर लोग इन बर्तनों को कला की दृष्टि से भी खरीदते हैं। वर्तमान में बाजार में वास्तुनुरूप उपलब्ध इन बर्तनों पर कारीगरी का अद्भुत नमूना देखते ही बनता है।


सौजन्य से - वेबदुनिया।

फैक्ट्री में वास्तुदोष निवारण

कई बार जब आप कोई नया उद्योग, धंधा स्थापित करते हैं लेकिन अथक परिश्रम करने के बाद भी उसमें आपको मनचाहा मुनाफा नहीं मिल पाता है। ऐसा वास्तुदोष के कारण होता है। हम आपको बताते हैं फैक्ट्री में वास्तुदोष से निजात पाने के कुछ आसान उपाय -

फैक्ट्री में तैयार माल हमेशा वायव्य कोण में रखें। ऐसा करने से आपका माल शीघ्र बिक जाएगा।

तैयार माल को ले जाने के लिए गाड़ियों की पार्किंग पूर्व या उत्तर दिशा में करना श्रेष्ठ है।

फैक्ट्री या उद्योग भवन के प्रवेश द्वार के आगे बिजली या टेलीफोन का खंभा होना अशुभ होता है।

फैक्ट्री में भारी मशीनें हमेशा नैऋत्य कोण में रखी जानी चाहिए।

फैक्ट्री मालिक का हमेशा बीमार व परेशान रहना भी उसके व्यवसाय को प्रभावित करता है।


सौजन्य से - डायमंड कॉमिक्स प्रकाशन लि।

वास्तु टिप्स

कई बार हम बहुत सी छोटी-मोटी गलतियाँ कर बैठते हैं तथा इस वजह से गलत दिशा में सामान रखने के कारण हमारे घर-परिवार में सुख-शांति छिन जाती है। वास्तु में दिशाओं का बड़ा महत्व है इसलिए घर में कोई भी सामान रखने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि उस सामान को किस दिशा में रखा जाना चाहिए।

वास्तु टिप्स :

शयनकक्ष में झाडू न रखें। तेल का कनस्तर, अँगीठी आदि न रखें। व्यर्थ की चिंता बनी रहेगी। यदि कष्ट हो रहा है तो तकिए के नीचे लाल चंदन रख कर सोएँ।

यदि दुकान में चोरी होती है तो दुकान की चौखट के पास पूजा करके मंगल यंत्र स्थापित करें।

दुकान में मन नहीं लगता तो श्वेत गणपति की मूर्ति विधिवत पूजा करके मुख्य द्वार के आगे और पीछे स्थापित करना चाहिए।

यदि दुकान का मुख्य द्वार अशुभ है या दक्षिण पश्चिम या दक्षिण दिशा में है तो ‘यमकीलक यंत्र' का पूजन करके स्थापना करें।

यदि सरकारी कर्मचारी द्वारा परेशान हैं तो सूर्य यंत्र की विधिवत पूजा करके दुकान में स्थापना करें।

रविवार, 20 मार्च 2011

घर को बुरी नजर से बचाने के लिए क्या करें?

क्या आप नए घर या फ्लेट में प्रवेश करने जा रहे है? और आप ये चाहते हैं कि नए घर में आपका परिवार खुशी व आनंद से रहे। ऐसा सिर्फ तभी संभव है जब आपका घर हर तरह की नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी नजर से सुरक्षित रहे । अपने घर को आप यदि बुरी नजर से बचाना चाहते हैं तो नीचे लिखे उपाय करें-

- नए घर को बुरी नजर से बचाने के लिए शुक्रवार को अशोक वृक्ष के पत्तों को धागे या पतली सूत से बांध कर बंदरवाल बना लें। इन पत्तों पर लाल चन्दन या सिन्दूर से गं नामक गणेश जी का बीज मंत्र लिख दें।

- मंत्र लिखने के बाद इस बंदरवाल को घर के मुख्य द्वार पर इस प्रकार बांध दें कि हर व्यक्ति इसके नीचे से घर में प्रवेश करे। ऐसा करने से बुरे विचार या नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जायेगा व भवन पर शुभ प्रभाव पड़ेगा।

- अपने भवन के दक्षिण हिस्से में सबसे ऊपर केसरिया रंग के कपड़े की झंडी लगाना चाहिए। इसे मंगलवार के दिन लगाना चाहिए। ऐसा करने से घर आकस्मिक, विपदा, कलह इत्यादि से बचा रहता है।

- अपने भवन को बुरी नजर, बुरे प्रभाव, नकारात्मक उर्जा से बचाने हेतु भवन के मुख्य द्वार के दोनों पिलरों(खंबों) पर स्वास्तिक का चिन्ह, बेल-बुटे, नाचते मोर, गाय- बछड़े आदि शुभचिह्न जरुर बनाएं।

इन उपायों को अपनाने से आपका नया घर हमेशा बुरी नजर से बचा रहेगा।

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

सोमवार को शिवजी का दिन क्यों हैं?

जीवन की हर समस्या का शिवजी की पूजा आसानी से हल हो सकती है। इनकी पूजा के लिए कोई विशेष दिन या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी कई विद्वानों द्वारा शिव पूजा के लिए सोमवार का दिन श्रेष्ठ माना गया है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवार चंद्र देव का दिन माना गया है। कुंडली में चंद्र का महत्वपूर्ण स्थान है। चंद्र के आधार पर ही हमारी जन्म राशि का निर्धारण होता है। यदि जन्म कुंडली में चंद्र से संबंधित कोई दोष हो तो सोमवार के दिन शिवजी के पूजन से वह दोष शांत हो जाता है। शिव को शशिधर भी कहा जाता है क्योंकि शिवजी ने चंद्र को अपने मस्तक पर धारण कर रखा है।

शास्त्रों के अनुसार सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए अलग-अलग विशेष दिन निर्धारित किए गए हैं। सोम शब्द का अर्थ होता है चंद्रमा। चंद्रमा को चंचल ग्रह माना गया है, साथ ही यह हमारे मन का नियंत्रक भी है। चंद्र को शिव ने मस्तक पर स्थान दिया है अर्थात् शिव सच्चे मन से उनकी आराधना करने वाले श्रद्धालु को अपने मस्तक पर चंद्र के समान सुशोभित करते हैं। इस बात का मतलब यही है वे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। भगवान अपने भक्तों के अधिन माने गए हैं।

शिवजी का सोमवार से सीधा संबंध है। सोम शब्द में ऊँ शब्द भी विद्यमान है। ऊँ शिवजी का ही प्रतीक है। सोमवार, चंद्रमा और शिवजी इन तीनों का आपस में गहरा संबंध है। इसी वजह से प्राचीनकाल से ही सोमवार को शिवजी का दिन माना जाता है।

गीता प्रेस की स्थापना कैसे हुई?




इस देश में संत महात्माओं की कमी नहीं, शाही जिंदगी जीने वाले और कॉरेपोरेट घरानों के लिए कथा करने वाले इन संत-महात्माओं ने अपने ऑडिओ-वीडिओ जारी करने, अपनी शोभा यात्राएं निकालने, अपने नाम और फोटो के साथ पत्रिकाएं प्रकाशित करने और टीवी चैनलों पर समय खरीदकर अपना चेहरा दिखाकर जन मानस में अपना प्रचार करने के अलावा कुछ नहीं किया। मगर इस देश के सभी संत और महात्मा मिलकर भी गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक कर्मयोगी स्वर्गीय हनुमान प्रसाद पोद्दार की जगह नहीं ले सकते। शायद आज की पीढ़ी को तो पता ही नहीं होगा कि भारतीय अध्यात्मिक जगत पर हनुमान पसाद पोद्दार नामका एक ऐसा सूरज उदय हुआ जिसकी वजह से देश के घर-घर में गीता, रामायण, वेद और पुराण जैसे ग्रंथ पहुँचे सके।

आज `गीता प्रेस गोरखपुर' का नाम किसी भी भारतीय के लिए अनजाना नहीं है। सनातन हिंदू संस्कृति में आस्था रखने वाला दुनिया में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जो गीता प्रेस गोरखपुर के नाम से परिचित नहीं होगा।

करीब 90 साल पहले यानी 1923 में स्थापित गीता प्रेस द्वारा अब तक 45.45 करोड़ से भी अधिक प्रतियों का प्रकाशन किया जा चुका है। इनमें 8.10 करोड़ भगवद्गीता और 7.5 करोड़ रामचरित मानस की प्रतियां हैं। गीता प्रेस में प्रकाशित महिला और बालोपयोगी साहित्य की 10.30 करोड़ प्रतियों पुस्तकों की बिक्री हो चुकी है।

गीता प्रेस ने 2008-09 में 32 करोड़ रुपये मूल्य की किताबों की बिक्री की। यह आंकड़ा इससे पिछले साल की तुलना में 2.5 करोड़ रुपये ज्यादा है। बीते वित्त वर्ष में गीता प्रेस ने पुस्तकों की छपाई के लिए 4,500 टन कागज का इस्तेमाल किया।

गीता प्रेस की लोकप्रिय पत्रिका कल्याण की हर माह 2.30 लाख प्रतियां बिकती हैं। बिक्री के पहले बताए गए आंकड़ों में कल्याण की बिक्री शामिल नहीं है। गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग इतनी ज्यादा है कि यह प्रकाशन हाउस मांग पूरी नहीं कर पा रहा है। औद्योगिक रूप से पिछडे¸ पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस प्रकाशन गृह से हर साल 1.75 करोड़ से ज्यादा पुस्तकें देश-विदेश में बिकती हैं।

गीता पे्रस के प्रोडक्शन मैनेजर लालमणि तिवारी कहते हैं, हम हर रोज 50,000 से ज्यादा किताबें बेचते हैं। दुनिया में किसी भी पब्लिशिंग हाउस की इतनी पुस्तकें नहीं बिकती हैं। धार्मिक किताबों में आज की तारीख में सबसे ज्यादा मांग रामचरित मानस की है। अग्रवाल ने कहा कि हमारे कुल कारोबार में 35 फीसदी योगदान रामचरित मानस का है। इसके बाद 20 से 25 प्रतिशत का योगदान भगवद्गीता की बिक्री का है।

इस देश में और दुनिया के हर कोने में रामायण, गीता, वेद, पुराण और उपनिषद से लेकर प्राचीन भारत के ऋषियों -मुनियों की कथाओं को पहुँचाने का एक मात्र श्रेय गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार को है। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर एक अकिंचन सेवक और निष्काम कर्मयोगी की तरह भाईजी ने हिंदू संस्कृति की मान्यताओं को घर-घर तक पहुँचाने में जो योगदान दिया है, इतिहास में उसकी मिसाल मिलना ही मुश्किल है। भारतीय पंचांग के अनुसार विक्रम संवत के वर्ष 1949 में अश्विन कृष्ण की प्रदोष के दिन उनका जन्म हुआ।

राजस्थान के रतनगढ़ में लाला भीमराज अग्रवाल और उनकी पत्नी रिखीबाई हनुमान के भक्त थे, तो उन्होंने अपने पुत्र का नाम हनुमान प्रसाद रख दिया। दो वर्ष की आयु में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो जाने पर इनका पालन-पोषण दादी माँ ने किया। दादी माँ के धार्मिक संस्कारों के बीच बालक हनुमान को बचपन से ही गीता, रामायण वेद, उपनिषद और पुराणों की कहानियाँ पढ़ने-सुनने को मिली। इन संस्कारों का बालक पर गहरा असर पड़ा। बचपन में ही इन्हें हनुमान कवच का पाठ सिखाया गया। निंबार्क संप्रदाय के संत ब्रजदास जी ने बालक को दीक्षा दी।

उस समय देश गुलामी की जंजीरों मे जकड़ा हुआ था। इनके पिता अपने कारोबार का वजह से कलकत्ता में थे और ये अपने दादाजी के साथ असम में। कलकत्ता में ये स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं, झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो भाई जी उनके संपर्क में आए इसके बाद उनकी मुलाकात गाँधीजी से हुई। वीर सावकरकर द्वारा लिखे गए '1857 का स्वातंत्र्य समर ग्रंथ' से भाई जी बहुत प्रभावित हुए और 1938 में वे वीर सावरकर से मिलने के लिए मुंबई चले आए। उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग किए जाने के खिलाफ आंदोलन चलाया और विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया। युवावस्था में ही उन्होंने खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना शुरु कर दिया। विक्रम संवत 1971 में जब महामना पं. मदन मोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह करने के उद्देश्य से कलकत्ता आए तो भाईजी ने कई लोगों से मिलकर इस कार्य के लिए दान-राशि दिलवाई।

कलकत्ता में आजादी आंदोलन और क्रांतिकारियों के साथ काम करने के एक मामले में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार सहित कई प्रमुख व्यापारियों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के हथियारों के एक जखीरे को लूटकर उसे छिपाने में मदद की थी। जेल में भाईजी ने हनुमान जी की आराधना करना शुरु करदी। बाद में उन्हें अलीपुर जेल में नज़रबंद कर दिया गया। नज़रबंदी के दौरान भाईजी ने समय का भरपूर सदुपयोग किया वहाँ वे अपनी दिनचर्या सुबह तीन बजे शुरु करते थे और पूरा समय परमात्मा का ध्यान करने में ही बिताते थे। बाद में उन्हें नजरबंद रखते हुए पंजाब की शिमलपाल जेल में भेज दिया गया। वहाँ कैदी मरीजों के स्वास्थ्य की जाँच के लिए एक होम्योपैथिक चिकित्सक जेल में आते थे, भाई जी ने इस चिकित्सक से होम्योपैथी की बारीकियाँ सीख ली और होम्योपैथी की किताबों का अध्ययन करने के बाद खुद ही मरीजों का इलाज करने लगे। बाद में वे जमनालाल बजाज की प्रेरणा से मुंबई चले आए। यहाँ वे वीर सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महादेव देसाई और कृष्णदास जाजू जैसी विभूतियों के निकट संपर्क में आए।

मुंबई में उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। इसके बाद वे प्रसिध्द संगीताचार्य विष्णु दिगंबर के सत्संग में आए और उनके हृदय में संगीत का झरना बह निकला। फिर उन्होंने भक्ति गीत लिखे जो `पत्र-पुष्प' के नाम से प्रकाशित हुए। मुंबई में वे अपने मौसेरे भाई जयदयाल गोयनका जी के गीता पाठ से बहुत प्रभावित थे। उनके गीता के प्रति प्रेम और लोगों की गीता को लेकर जिज्ञासा को देखते हुए भाई जी ने इस बात का प्रण किया कि वे श्रीमद् भागवद्गीता को कम से कम मूल्य पर लोगों को उपलब्ध कराएंगे। फिर उन्होंने गीता पर एक टीका लिखी और उसे कलकत्ता के वाणिक प्रेस में छपवाई। पहले ही संस्करण की पाँच हजार प्रतियाँ बिक गई। लेकिन भाईजी को इस बात का दु:ख था कि इस पुस्तक में ढेरों गलतियाँ थी। इसके बाद उन्होंने इसका संशोधित संस्करण निकाला मगर इसमें भी गलतियाँ दोहरा गई थी। इस बात से भाई जी के मन को गहरी ठेस लगी और उन्होंने तय किया कि जब तक अपना खुद का प्रेस नहीं होगा, यह कार्य आगे नहीं बढ़ेगा। बस यही एक छोटा सा संकल्प गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना का आधार बना। उनके भाई गोयनका जी व्यापार तब बांकुड़ा (बंगाल) में था और वे गीता पर प्रवचन के सिलसिले में प्राय: बाहर ही रहा करते थे। तब समस्या यह थी कि प्रेस कहाँ लगाई जाए। उनके मित्र घनश्याम दास जालान गोरखपुर में ही व्यापार करते थे। उन्होने प्रेस गोरखपुर में ही लगाए जाने और इस कार्य में भरपूर सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मई 1922 में गीता प्रेस का स्थापना की गई।

1926 में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन दिल्ली में था। सेठ जमनालाल बजाज अधिवेशन के सभापति थे। इस अवसर पर सेठ घनश्यामदास बिड़ला भी मौजूद थे। बिड़लाजी ने भाई जी द्वारा गीता के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए उनसे आग्रह किया कि सनातन धर्म के प्रचार और सद्विचारों को लोगों तक पहुँचाने के लिए एक संपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। बिड़ला जी के इन्हीं वाक्यों ने भाई जी को कल्याण नाम की पत्रिका के प्रकाशन के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद भाई जी ने मुंबई पहुँचकर अपने मित्र और धार्मिक पुस्तकों के उस समय के एक मात्र प्रकाशक खेमराज श्री कृष्णदास के मालिक कृष्णदास जी से `कल्याण' के प्रकाशन की योजना पर चर्चा की। इस पर उन्होंने भाई जी से कहा आप इसके लिए सामग्री एकत्रित करें इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी मैं सम्हाल लूंगा। इसके बाद अगस्त 1955 में कल्याण का पहला प्रवेशांक निकला। कहना न होगा कि इसके बाद `कल्याण' भारतीय परिवारों के बीच एक लोकप्रिय ही नहीं बल्कि एक संपूर्ण पत्रिका के रुप में स्थापित हो गई और आज भी धार्मिक जागरण में कल्याण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। `कल्याण' तेरह माह तक मुंबई से प्रकाशित होती रही। इसके बाद अगस्त 1926 से गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने लगी।

भाईजी ने कल्याण को एक आदर्श और रुचिकर पत्रिका का रुप देने के लिए तब देश भर के महात्माओं धार्मिक विषयों में दखल रखने वाले लेखकों और संतों आदि को पत्र लिखकर इसके लिए विविध विषयों पर लेख आमंत्रित किए। इसके साथ ही उन्होंने श्रेष्ठतम कलाकारों से देवी-देवताओं के आकर्षक चित्र बनवाए और उनको कल्याण में प्रकाशित किया। भाई जी इस कार्य में इतने तल्लीन हो गए कि वे अपना पूरा समय इसके लिए देने लगे। कल्याण की सामग्री के संपादन से लेकर उसके रंग-रुप को अंतिम रुप देने का कार्य भी भाईजी ही देखते थे। इसके लिए वे प्रतिदिन अठारह घंटे देते थे। कल्याण को उन्होंने मात्र हिंदू धर्म की ही पत्रिका के रुप में पहचान देने की बजाय उसमे सभी धर्मों के आचार्यों, जैन मुनियों, रामानुज, निंबार्क, माध्व आदि संप्रदायों के विद्वानों के लेखों का प्रकाशन किया।

भाईजी ने अपने जीवन काल में गीता प्रेस गोरखपुर में पौने छ: सौ से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित की। इसके साथ ही उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि पाठकों को ये पुस्तकें लागत मूल्य पर ही उपलब्ध हों। कल्याण को और भी रोचक व ज्ञानवर्धक बनाने के लिए समय-समय पर इसके अलग-अलग विषयों पर विशेषांक प्रकाशित किए गए। भाई जी ने अपने जीवन काल में प्रचार-प्रसार से दूर रहकर ऐसे ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जिसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। १९३६ में गोरखपुर में भयंकर बाढ़ आगई थी। बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के निरीक्षण के लिए पं. जवाहरलाल नेहरु -जब गोरखपुर आए तो तत्कालीन अंग्रेज सरकार के दबाव में उन्हें वहाँ किसी भी व्यक्ति ने कार उपलब्ध नहीं कराई, क्योंकि अंग्रेज कलेक्टर ने सभी लोगों को धौंस दे रखी थी कि जो भी नेहरु जी को कार देगा उसका नाम विद्रोहियों की सूची में लिख दिया जाएगा। लेकिन भाई जी ने अपनी कार नेहरु जी को दे दी।

१९३८ में जब राजस्तथान में भयंकर अकाल पड़ा तो भाई जी अकाल पीड़ित क्षेत्र में पहुँचे और उन्होंने अकाल पीड़ितों के साथ ही मवेशियों के लिए भी चारे की व्यवस्था करवाई। बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारका, कालड़ी श्रीरंगम आदि स्थानों पर वेद-भवन तथा विद्यालयों की स्थापना में भाईजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने जीवन-काल में भाई जी ने २५ हजार से ज्यादा पृष्ठों का साहित्य-सृजन किया।

फिल्मों का समाज पर कैसा दुष्परिणाम आने वाला है इन बातों की चेतावनी भाई जी ने अपनी पुस्तक `सिनेमा मनोरंजन या विनाश' में दे दी थी। दहेज के नाम पर नारी उत्पीड़न को लेकर भाई जी ने `विवाह में दहेज' जैसी एक प्रेरक पुस्तक लिखकर इस बुराई पर अपने गंभीर विचार व्यक्त किए थे। महिलाओं की शिक्षा के पक्षधर भाई जी ने `नारी शिक्षा' के नाम से और शिक्षा-पध्दति में सुधार के लिए वर्तमान शिक्षा के नाम से एक पुस्तक लिखी। गोरक्षा आंदोलन में भी भाई जी ने भरपूर योगदान दिया। भाई जी के जीवन से कई चमत्कारिक और प्रेरक घटनाएं जुड़ी हुई है। लेकिन उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि एक संपन्न परिवार से संबंध रखने और अपने जीवन काल में कई महत्वपूर्ण लोगों से जुड़े होने और उनकी निकटता प्राप्त करने के बावजूद भाई जी को अभिमान छू तक नहीं गया था। वे आजीवन आम आदमी के लिए सोचते रहे। इस देश में सनातन धर्म और धार्मिक साहित्य के प्रचार और प्रसार में उनका योगदान उल्लेखनीय है। गीता प्रेस गोरखपुर से पुस्तकों के प्रकाशन से होने वाली आमदनी में से उन्होंने एक हिस्सा भी नहीं लिया और इस बात का लिखित दस्तावेज बनाया कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य इसकी आमदनी में हिस्सेदार नहीं रहेगा।

अंग्रेजों के जमाने में गोरखपुर में उनकी धर्म व साहित्य सेवा तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर पेडले ने उन्हें `राय साहब' की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन भाई जी ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद अंग्रेज कमिश्नर होबर्ट ने `राय बहादुर' की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा लेकिन भाई जी ने इस प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया।

देश की स्वाधीनता के बाद डॉ, संपूर्णानंद, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य लोगों के परामर्श से तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भाई जी को `भारत रत्न' की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा लेकिन भाई जी ने इसमें भी कोई रुचि नहीं दिखाई।

२२ मार्च १९७१ को भाई जी ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया और अपने पीछे वे `गीता प्रेस गोरखपुर' के नाम से एक ऐसा केंद्र छोड़ गए, जो हमारी संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाने में एक अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

रामचरित मानस का पाठ क्यों?

श्री राम चरित मानस अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा १६वीं सदी में रचा एक महाकाव्य है। श्री रामचरित मानस भारतीय संस्कृति मे एक विशेष स्थान रखती है। उत्तर भारत में रामायण के रूप में कई लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। श्री राम चरित मानस में श्री राम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में दर्शाया गया है जब कि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में श्री राम को एक मानव के रूप में दिखाया गया है। तुलसी के प्रभु राम सर्वशक्तिमान होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। शरद नवरात्रि में इस के सुन्दर काण्ड का पाठ पूरे नौ दिन किया जाता है।

गीताप्रेस गोरखपुर के श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के अनुसार रामचरितमानस को लिखने में गोस्वामी तुलसीदास जी को २ वर्ष ७ माह २६ दिन का समय लगा था और संवत् १६३३ (१५७६ ईस्वी) के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन उसे पूर्ण किया था. इस महाकाव्य की भाषा अवधी है जो कि हिंदी की ही एक शाखा है। रामचरितमानस को हिंदी साहित्य की एक महान कृति माना जाता है। रामचरितमानस को सामान्यतः 'तुलसी रामायण' या 'तुलसी कृत रामायण' भी कहा जाता है।

सभी विद्वानों द्वारा श्रीराम की जीवनगाथा श्रीरामचरित मानस पढऩे की सलाह दी जाती है। श्रीरामचरित मानस में जीवन प्रबंधन से जुड़े अमूल्य सूत्र हैं। राम का जीवन इस बात की प्रेरणा देता है कि आप समाज में कैसे रहें?
श्रीराम का संपूर्ण जीवन हमें आदर्श जीवन जीने के सूत्र ही बताता है।

श्रीराम के चरित्र की कुछ ही बातों को जीवन में उतार लिया जाए तो कोई भी सामान्य व्यक्ति भी महान बन सकता है। रामायण में वह सभी बातों का समावेश हैं जो हमें परिवार में रहना सिखाती हैं, समाज में रहना सिखाती है। रामायण का सरल रूप है गोस्वामी तुसलीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस।

तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस को इतना सरल रूप में लिखा है कि आसानी से सभी को समझ आ जाती है। आज के युग में सभी को उच्च जीवन जीने के लिए सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। बस यही मार्गदर्शन श्रीराम के जीवन से प्राप्त किया जा सकता है।

जिस प्रकार श्रीराम पुत्र का कर्तव्य निभाते हैं ठीक उसी तरह आज सभी संतानों को अपने-अपने माता-पिता की हर बात को मानना चाहिए। जिस प्रकार उन्होंने पत्नी सीता के साथ जीवन बिताया वह इस बात की प्रेरणा देता है कि आज के युग में पति-पत्नी को किस प्रकार रहना चाहिए? किसी भी विषम परिस्थिति में पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ बिल्कुल नहीं छोडऩा चाहिए तभी हर समस्या का हल आसानी से निकाला जा सकता है।

वहीं श्रीरामचरित मानस में भाइयों में कैसा प्रेम रहना चाहिए भी बताया गया है। मित्रता के संबंध में रामायण में कई प्रसंग दिए गए है जो आदर्श मित्रता की मिसाल है। ऐसे ही हमारे जीवन से जुड़े हर रिश्ते की मर्यादा, अधिकार और कर्तव्य आदि सभी बातों की जानकारी के लिए हमें श्रीरामचरित मानस पढऩे की सलाह दी जाती है।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

लड़कियां बिंदी क्यों लगाती हैं?


लड़कियों के माथे पर चमकती बिंदी उनकी सुंदरता में चार चांद लगा देती है। बिंदी स्त्रियों के श्रंगार में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह उनके 16 श्रंगार में से एक है। बिंदी का महत्व केवल सौंदर्य बढ़ाने वाले श्रंगार तक ही सीमित नहीं है। इसके अन्य लाभ भी हैं।

किसी भी लड़की के माथे पर चम-चम चमकती बिंदी किसी का भी मन बड़ी आसानी से मोह लेती है। कोई भी इसके आकर्षण से बच नहीं पाता। लड़कियां इसका उपयोग सुंदरता बढ़ाने के उद्देश्य से करती हैं और विवाहित महिलाओं के लिए यह सुहाग की निशानी मानी जाती है। हिंदू धर्म में शादी के बाद हर स्त्री को माथे पर लाल बिंदी लगाना आवश्यक परंपरा माना गया है।

बिंदी का संबंध हमारे मन से भी जुड़ा हुआ है। योग शास्त्र के अनुसार जहां बिंदी लगाई जाती है वहीं आज्ञा चक्र स्थित होता है। यह चक्र हमारे मन को नियंत्रित करता है। हम जब भी ध्यान लगाते हैं तब हमारा ध्यान यहीं केंद्रित होता है। यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना गया है। मन को एकाग्र करने के लिए इसी चक्र पर दबाव दिया जाता है। लड़कियां बिंदी इसी स्थान पर लगाती है।

बिंदी लगाने की परंपरा आज्ञा चक्र पर दबाव बनाने के लिए प्रारंभ की गई ताकि मन एकाग्र रहे। महिलाओं का मन अति चंचल होता है, अत: उनके मन को नियंत्रित और स्थिर रखने के लिए यह बिंदी बहुत कारगर उपाय है। इससे उनका मन शांत और एकाग्र रहता है।

क्या आपकी शादी अमीर लड़की से होगी...?


शादी एक ऐसा रिश्ता जिससे लड़के और लड़की के साथ-साथ दोनों के परिवारों का जीवन बदल जाता है। आज के दौर में कई लोग ऐसे हैं जो शादी को एक ऐसा माध्यम मानते हैं जिससे वे अपने परिवार की गरीबी दूर कर सकते हैं। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे लगातार प्रयासरत रहते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में कुछ योग ऐसे होते हैं जो बता देते हैं कि लड़के की शादी किसी अमीर घर में होगी या नहीं...
वे योग इस प्रकार है-
-चतुर्थेश या द्वितीयेश सप्तम हो तथा उस पर शुक्र की दृष्टि या शुक्र साथ में हो।
- सप्तमेश एवं धनेश ईशभावस्थ हो या एक राशि पर हो तथा शुक्र द्वारा दृष्ट हो।
-चंद्रमा सप्तमेश हो या चंद्रमा धन भाव में हो।
-द्वितीय स्थान का स्वामी सप्तम में बैठा हो और उस पर शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो।
-चतुर्थ स्थान का स्वामी सप्तम में तथा सप्तम का स्वामी चतुर्थ में हो तो ससुराल से लाभ मिलता है।
- यदि भाग्य स्थान प्रबल है तो भी किसी अमीर लड़की से विवाह के योग बनते हैं।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

दीपावली पूजन विधि


दीपावली पूजन विधि

कार्तिक मास की अमावस्या का दिन दीपावली के रूप में पूरे देश में बडी धूम-धाम से मनाया जाता हैं। इसे रोशनी का पर्व भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि कार्तिक अमावस्या को भगवान रामचन्द्र जी चौदह वर्ष का बनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। अयोध्या वासियों ने श्री रामचन्द्र के लौटने की खुशी में दीप जलाकर खुशियाँ मनायी थीं, इसी याद में आज तक दीपावली पर दीपक जलाए जाते हैं और कहते हैं कि इसी दिन महाराजा विक्रमादित्य का राजतिलक भी हुआ था। आज के दिन व्यापारी अपने बही खाते बदलते है तथा लाभ हानि का ब्यौरा तैयार करते हैं। दीपावली पर जुआ खेलने की भी प्रथा हैं। इसका प्रधान लक्ष्य वर्ष भर में भाग्य की परीक्षा करना है। लोग जुआ खेलकर यह पता लगाते हैं कि उनका पूरा साल कैसा रहेगा।

पूजन विधानः दीपावली पर माँ लक्ष्मी व गणेश के साथ सरस्वती मैया की भी पूजा की जाती है। भारत मे दीपावली परम्प रम्पराओं का त्यौंहार है। पूरी परम्परा व श्रद्धा के साथ दीपावली का पूजन किया जाता है। इस दिन लक्ष्मी पूजन में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र की पूजा की जाती है। इसी तरह लक्ष्मी जी का पाना भी बाजार में मिलता है जिसकी परम्परागत पूजा की जानी अनिवार्य है। गणेश पूजन के बिना कोई भी पूजन अधूरा होता है इसलिए लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन भी किया जाता है। सरस्वती की पूजा का कारण यह है कि धन व सिद्धि के साथ ज्ञान भी पूजनीय है इसलिए ज्ञान की पूजा के लिए माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।

इस दिन धन व लक्ष्मी की पूजा के रूप में लोग लक्ष्मी पूजा में नोटों की गड्डी व चाँदी के सिक्के भी रखते हैं। इस दिन रंगोली सजाकर माँ लक्ष्मी को खुश किया जाता है। इस दिन धन के देवता कुबेर, इन्द्र देव तथा समस्त मनोरथों को पूरा करने वाले विष्णु भगवान की भी पूजा की जाती है। तथा रंगोली सफेद व लाल मिट्टी से बनाकर व रंग बिरंगे रंगों से सजाकर बनाई जाती है।

विधिः दीपावली के दिन दीपकों की पूजा का विशेष महत्व हैं। इसके लिए दो थालों में दीपक रखें। छः चौमुखे दीपक दोनो थालों में रखें। छब्बीस छोटे दीपक भी दोनो थालों में सजायें। इन सब दीपको को प्रज्जवलित करके जल, रोली, खील बताशे, चावल, गुड, अबीर, गुलाल, धूप, आदि से पूजन करें और टीका लगावें। व्यापारी लोग दुकान की गद्दी पर गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा रखकर पूजा करें। इसके बाद घर आकर पूजन करें। पहले पुरूष फिर स्त्रियाँ पूजन करें। स्त्रियाँ चावलों का बायना निकालकर कर उस रूपये रखकर अपनी सास के चरण स्पर्श करके उन्हें दे दें तथा आशीवार्द प्राप्त करें। पूजा करने के बाद दीपकों को घर में जगह-जगह पर रखें। एक चौमुखा, छः छोटे दीपक गणेश लक्ष्मीजी के पास रख दें। चौमुखा दीपक का काजल सब बडे बुढे बच्चे अपनी आँखो में डालें।

दीपावली पूजन कैसे करें

प्रातः स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें-

मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-

सकलशुभफल प्राप्त्यर्थं

गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं

इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।

संध्या के समय पुनः स्नान करें।

लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का छायाचित्र भी लगाया जा सकता है।)

भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाएं।

लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बाँधें।

इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें।

फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें।

अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें।

इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं।

फिर जल, मौली, चावल, फल, गुढ़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें।

पूजा पहले पुरुष तथा बाद में स्त्रियां करें।

पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें।

एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-

नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया।

या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥

इस मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-

ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः।

शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥

इस मंत्र से कुबेर का ध्यान करें-

धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।

भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥

इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें।

तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को आशीष और उपहार दें।

लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है।

इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। समीप ही एक सौ एक रुपए, सवा सेर चावल, गुढ़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पाँच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें।

उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएँ।

दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आँखों में लगाएं।

फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें।

इस दिन घर में बिल्ली आए तो उसे भगाएँ नहीं।

बड़े-बुजुर्गों के चरणों की वंदना करें।

व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें।

रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल्ल, लोढ़ा तथा छाज (सूप) पर कंकू से तिलक करें। (हालांकि आजकल घरों मे ये सभी चीजें मौजूद नहीं है लेकिन भारत के गाँवों में और छोटे कस्बों में आज भी इन सभी चीजों का विशेष महत्व है क्योंकि जीवन और भोजन का आधार ये ही हैं)

दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें 'लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ'।

लक्ष्मी पूजन के बाद अपने घर के तुलसी के गमले में, पौधों के गमलों में घर के आसपास मौजूद पेड़ के पास दीपक रखें और अपने पड़ोसियों के घर भी दीपक रखकर आएं।

मंत्र-पुष्पांजलि :

( अपने हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रों को बोलें) :-

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्‌ ।

तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।

स मे कामान्‌ कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥

कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ।

ॐ महालक्ष्म्यै नमः, मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि ।

(हाथ में लिए फूल महालक्ष्मी पर चढ़ा दें।)

प्रदक्षिणा करें, साष्टांग प्रणाम करें, अब हाथ जोड़कर निम्न क्षमा प्रार्थना बोलें :-

क्षमा प्रार्थना :

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्‌ ॥

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वम्‌ मम देवदेव ।

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।

त्राहि माम्‌ परमेशानि सर्वपापहरा भव ॥

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥

पूजन समर्पण :

हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलें :-

'ॐ अनेन यथाशक्ति अर्चनेन श्री महालक्ष्मीः प्रसीदतुः'

(जल छोड़ दें, प्रणाम करें)

विसर्जन :

अब हाथ में अक्षत लें (गणेश एवं महालक्ष्मी की प्रतिमा को छोड़कर अन्य सभी) प्रतिष्ठित देवताओं को अक्षत छोड़ते हुए निम्न मंत्र से विसर्जन कर्म करें :-

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्‌ ।

इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनर्अपि पुनरागमनाय च ॥

ॐ आनंद ! ॐ आनंद !! ॐ आनंद !!!

लक्ष्मीजी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।

तुमको निसदिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय...

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।

सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय...

तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।

जोकोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय...

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय...

जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।

सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय...

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।

खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय...

शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।

रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय...

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।

उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय...

(आरती करके शीतलीकरण हेतु जल छोड़ें एवं स्वयं आरती लें, पूजा में सम्मिलित सभी लोगों को आरती दें फिर हाथ धो लें।)

परमात्मा की पूजा में सबसे ज्यादा महत्व है भाव का, किसी भी शास्त्र या धार्मिक पुस्तक में पूजा के साथ धन-संपत्ति को नहीं जो़ड़ा गया है। इस श्लोक में पूजा के महत्व को दर्शाया गया है-

'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्यु पहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥'

पूज्य पांडुरंग शास्त्री अठवलेजी महाराज ने इस श्लोक की व्याख्या इस तरह से की है

'पत्र, पुष्प, फल या जल जो मुझे (ईश्वर को) भक्तिपूर्वक अर्पण करता है, उस शुद्ध चित्त वाले भक्त के अर्पण किए हुए पदार्थ को मैं ग्रहण करता हूँ।'

भावना से अर्पण की हुई अल्प वस्तु को भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं। पूजा में वस्तु का नहीं, भाव का महत्व है।

परंतु मानव जब इतनी भावावस्था में न रहकर विचारशील जागृत भूमिका पर होता है, तब भी उसे लगता है कि प्रभु पर केवल पत्र, पुष्प, फल या जल चढ़ाना सच्चा पूजन नहीं है। ये सभी तो सच्चे पूजन में क्या-क्या होना चाहिए, यह समझाने वाले प्रतीक हैं।

पत्र यानी पत्ता। भगवान भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं। भगवान शिवजी बिल्व पत्र से प्रसन्न होते हैं, गणपति दूर्वा को स्नेह से स्वीकारते हैं और तुलसी नारायण-प्रिया हैं! अल्प मूल्य की वस्तुएं भी हृदयपूर्वक भगवद् चरणों में अर्पण की जाए तो वे अमूल्य बन जाती हैं। पूजा हृदयपूर्वक होनी चाहिए, ऐसा सूचित करने के लिए ही तो नागवल्ली के हृदयाकार पत्ते का पूजा सामग्री में समावेश नहीं किया गया होगा न!

पत्र यानी वेद-ज्ञान, ऐसा अर्थ तो गीताकार ने खुद ही 'छन्दांसि यस्य पर्णानि' कहकर किया है। भगवान को कुछ दिया जाए वह ज्ञानपूर्वक, समझपूर्वक या वेदशास्त्र की आज्ञानुसार दिया जाए, ऐसा यहां अपेक्षित है। संक्षेप में पूजन के पीछे का अपेक्षित मंत्र ध्यान में रखकर पूजन करना चाहिए। मंत्रशून्य पूजा केवल एक बाह्य यांत्रिक क्रिया बनी रहती है, जिसकी नीरसता ऊब निर्माण करके मानव को थका देती है। इतना ही नहीं, आगे चलकर इस पूजाकांड के लिए मानवके मन में एक प्रकार की अरुचि भी निर्माण होती है।

रविवार, 12 सितंबर 2010

गुरु ग्रंथ साहिब पढ़कर खुश हुआ बादशाह अकबर

सिक्खों के पांचवे गुरु श्री अर्जुनदेव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया। उस समय मुगलकाल का दौर था और अकबर की बादशाहत थी। अर्जुनदेवजी से ईष्र्या रखने वाले लोगों ने बादशाह अकबर को गुरुदेव और गुरु ग्रंथ के खिलाफ भड़काया और कहा कि गुरुग्रंथ साहिब में हिंदू और मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। जिससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।

अकबर ने यह सारी बातें सुनकर तुरंत ही गुरुदेव से ग्रंथ साहिब मंगवाया।

गुरुदेव को बादशाह का संदेश मिलने पर उन्होंने अपने प्रिय बुड्ढाजी को गुरुग्रंथ के साथ अकबर के पास भेजा। अकबर ने बुड्ढाजी से ग्रंथ साहिब के संबंध मे सुनी सारी बातें कह सुनाई। बुड्ढाजी ने बादशाह से कहा आप खुद ग्रंथ साहिब को कही से भी खोलकर पढ़ लें। आपकी सारी शंकाओं का समाधान हो जाएगा।

बादशाह अकबर ने ग्रंथ साहिब के पन्ने पलटना शुरू किए, एक पन्ने पर राग रामकली में लिखा पद देखा-
कोई बोलै राम राम, कोई खुदाई।
कोई सेवै गुसइयां, कोई अलाहि॥
कारण करण करीम।
किरपा धारि रहीम॥
कोई न्हावै तीरथि, कोई हज जाई।
कोई करै पूजा, कोई सिरु निवाई॥
कोई पढ़ै वेद, कोई कतेब।
कोई औढ़ै नील कोई सुपेद॥
कोई कहै तुरुक, कोई कहै हिंदू।
कोई बांछै भिसतु, कोई सुरगिंदू॥
कहु नानक जिति हुकमु पछाना।
प्रभु साहिब का तिनि भेदु न जाना॥

यह पद पढ़कर बादशाह अकबर की खुशी का ठिकाना ना रहा और उसने देखा पूरे ग्रंथ में इस तरह की कई पंक्तियां हैं। इसके बाद बादशाह अकबर ग्रंथ साहिब से इतने प्रभावित हुए कि वे खुद गुरु अर्जुनदेवजी से मिलने अमृतसर श्री हरिमंदिर साहिब पहुंच गए।

अकबर ने हरमंदिर साहिब के दर्शन कर ५१ अशर्फियां चढ़ाई। अब वे गुरुदेव से मिलने पहुंचे। अकबर गुरुदेव से मिलकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने गुरुजी को कोई जागीर देने की इच्छा जताई।

उस समय पंजाब में किसानों की फसल अच्छी नहीं हुई थी और वे बादशाह अकबर का लगान चुकाने में असमर्थ थे। बस गुरुदेव ने किसानों को उस लगान से मुक्त करने की बात बादशाह के सामने रखी। मुगल बादशाह कभी लगान नहीं छोड़ते थे परंतु गुरुदेव की बात मानकर अकबर ने किसानों का लगान माफ कर दिया। इस बात से बादशाह अकबर के मन में गुरुदेव के प्रति आस्था और बढ़ गई।

टोटके : क्या आप चाहते हैं लहलहाते बाल

भागदौड़ भरी जिंदगी और अव्यवस्थित दिनचर्या के कारण युवाओं को बहुत सी स्वास्थ्यगत परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अधिकतर युवाओं में एक समस्या बहुत मिलती-जुलती है, कम उम्र में ही बाल झड़ने की।

तंत्र शास्त्र में कई ऐसे टोटके हैं जिसके जरिए हम खुबसूरत बाल पा सकते हैं, बालों का झड़ना रोक सकते हैं।

अगर आपके बाल बहुत ज्यादा झड़ते हैं तो एक प्रयोग हम आपको बता रहे हैं। यह सिद्ध प्रयोग है और इसके करने से निश्चित ही आपको लाभ भी मिलेगा।

बाजार से एक मोती शंख खरीद लें। एक दिन पहले इसमें साफ पानी भरकर रख लें। इस पानी में बाहरी धूल-मिट्टी न लगने पाए। अगले दिन इस पानी को अपने बालों में तेल की तरह लगाएं और सूखने दें। पानी लगाते समय इस मंत्र का जाप करें :

।। ऊँ ह्रीं ह्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं ऊँ।।

इसके बाद अपना सिर धो लीजिए। थोड़े दिन यह प्रयोग करने से ही आपको अपने बालों में फर्क महसूस होने लगेगा।

भगवान कृष्ण का महानिर्वाण


धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अन्त में दुर्योधन आदि मारे गये और कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत के युद्ध के पश्चात् सान्तवना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गये। गांधारी अपने सौ पुत्रों के मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थी। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे सौ पुत्रों का नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी आपस में एक दूसरे को मारने के कारण नाश हो जायेगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति फेर दी।

एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। इस पर दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया कि यादव वंश का नाश हो जाए। उनके शाप के प्रभाव से यदुवंशी पर्व के दिन प्रभास क्षेत्र में आये। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले हो कर एक दूसरे को मारने लगे। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण को छोड़ कर एक भी यादव जीवित न बचा।

इस घटना के बाद भगवान श्रीकृष्ण महाप्रयाण कर स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गए। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्री कृष्णचन्द्र स्वधाम को पधार गये। इस तरह गांधारी तथा ऋषि दुर्वासा के श्राप से समस्त यदुवंश का नाश हो गया।

सफलता के नशे में माता-पिता को मत भूलो

राजा ज्ञानसेन के दरबार में प्राय: शास्त्रार्थ हुआ करता था। शास्त्रार्थ में जो विजयी होता, ज्ञानसेन उसे धन और मान से उपकृत करते। ज्ञान की ऐसी प्रतिस्पर्धा और फिर श्रेष्ठ ज्ञानी उपलब्धि में राजा ज्ञानसेन को आनंद की अनुभूति होती थी।

एक दिन ज्ञान सेन के दरबार में शास्त्रार्थ चल रहा था। उस शास्त्रार्थ में विद्वान भारवि विजेता घोषित किए गए। राजा ज्ञानसेन ने उन्हें हाथी पर बैठाया और स्वयं चंवर डुलाते हुए उनके घर तक ले गए। भारवि जब ऐसे बड़े सम्मान के साथ घर पहुंचे तो उनके माता-पिता की खुशी का ठीकाना न रहा। घर लौटकर भारवि ने सर्वप्रथम अपनी माता को प्रणाम किया किंतु पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन मात्र किया। माता को यह उचित नहीं लगा। उन्होंने भारवि को साष्टांग दंडवत के लिए इशारा किया तो उन्होंने बड़े बेमन से इसका निर्वाह किया। पिता ने भी अनिच्छा से चिरंजीवी रहो कह दिया।

बात समाप्त हो गई किंतु माता-पिता खिन्न बने रहे। उन्हें वैसी प्रसन्नता न थी जैसी होना चाहिए थी। कारण भी स्पष्ट था। कारण भी स्पष्ट था। किसी बड़ी उपलब्धि को अर्जित करने पर संतान जिस विनम्रता के भाव से माता-पिता को नमन करती हैं उसका भारवि में सर्वथा अभाव था। उन्हें तो राजा द्वारा हाथी पर बैठाकर चंवर डुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार था। इस अहंकार में उन्होंने शिष्टाचार व विनम्रता को भुला दिया था।

थोड़े दिनों तक माता-पिता की खिन्नता देखने के बाद भारवि माता से कारण पूछने गए। माता बोलीं- विजयी होकर लौटने के पीछे तुम्हारे पिता की कठोर साधना को तुम भुल गए। शास्त्रार्थ के दसों दिन उन्होंने मात्र जल लेकर तुम्हारी सफलता के लिए उपवार किया और उससे पूर्व पढ़ाने में कितना श्रम किया। यह तुम्हें याद ही न रहा। भारवि को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने माता-पिता से क्षमा मांगी।

वस्तुत: सफलता कितनी ही बड़ी क्यों ना हो ङ्क्षकतु उसके मूल में माता-पिता के स्नेह एवं परिश्रम को भुलाना नहीं चाहिए। उनसे सदैव विनम्र बने रहना चाहिए क्योंकि विनम्रता से ही ज्ञान शोभा पाता है ।

कैसे बनाएं बच्चों को आज्ञाकारी?

आधुनिक युग में बच्चों को अच्छे संस्कार देना कठिन होता जा रहा है। घरों में हावी होता आधुनिकवाद हमारी नैतिक शिक्षा से अलग जा रहा है। बच्चे अनियमित दिनचर्या, असंयमित व्यवहार कर रहे हैं। माता-पिता को सम्मान, बड़ों का कहना मानना या छोटों को प्यार करना लगभग हमारे परिवारों से दूर जा रहा है।

कई दम्पति बच्चों को ऊंची शिक्षा तो दिलवा रहे हैं लेकिन बच्चों के व्यवहार से खुद ही दु:खी भी हैं। संस्कारों की कमी, बड़ों का कहना न मानना, उम्र के मुताबिक व्यवहार न होना बच्चों में आम समस्या है। इस समस्या का अध्यात्मिक समाधान भी हमारे शास्त्रों में दिया गया है। कुछ छोटे-छोटे उपाय हैं जो आपके बच्चों को संस्कारवान बनाने में मदद करेंगे।

अगर बच्चे संस्कार भूल रहे हैं, असभ्य हो रहे हैं या फिर आपके कहने में नहीं है तो यह उपाय किया जा सकता है:--

सूर्योदय
से पूर्व जागकर नित्यकर्मों से निवृत्त होने के पश्चात, पूर्व दिशा की और मुख करके बैठें।
साधना के लिये लिये श्वेत कम्बल का आसन बिछाएं, तथा स्वयं भी स्वेत वस्त्र पहनें।
भुवन भास्कर का मानसिक ध्यान करते हुए श्वेत पुस्प अर्पित करें।
पंचोपचार एवं धूप ध्यान के पश्चात १०८ बार निम्र मंत्र का जप करें भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमही, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात।
मंत्र जप के पश्चात उगते हुए सूर्यदेव को जल चढ़ाएं एवं संतान की सद्बुद्धि के लिये प्रार्थना करें।

महावीर स्वामी के लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र:

मानव जीवन को सरल और महान बनाने के लिए महावीर स्वामी ने कई अमूल्य शिक्षाएं दी हैं। जिनमें सत्य को अपनाना, अहिंसा, अपरिहर्य, क्षमा, दया, करुणा, ब्रह्मचर्य, अधर्म को त्यागना शामिल है। उन्होंने त्याग, संयम, प्रेम, करुणा, शील, सदाचार का पवित्र संदेश फैलाया। भगवान महावीर ने चतुर्विध संघ की स्थापना की। महावीर स्वामी की शिक्षाएं:

सत्य: सत्य ही सच्चा तत्व है। वह बुद्धिमान प्राणी है जो सत्य को अपनाता है। सत्य का साथ देने से ही मनुष्य मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।

अहिंसा: संसार में जो भी जीव निवास करते हैं उनकी हिंसा नहीं और ऐसा होने से रोकना ही अहिंसा है। सभी प्राणियों पर दया का भाव रखना और उनकी रक्षा करना।

अपरिग्रह: जो मनुष्य सांसारिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह करता है और दूसरों को भी संग्रह की प्रेरणा देता है वह सदैव दुखों में फंसा रहता है। उसे कभी दुखों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

ब्रह्मचर्य: ब्रह्मचर्य ही तपस्या का सर्वोत्तम मार्ग है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन कठोरता से करते हैं, स्त्रियों के वश में नहीं हैं उन्हें मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य ही नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र,
संयम और विनय की जड़ है।

क्षमा: क्षमा के संबंध में महावीर कहते हैं 'संसार के सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है वैर किसी से नहीं है। मैं हृदय से धर्म का आचरण करता हूं। मैं सभी प्राणियों से जाने-अनजाने में किए अपराधों के लिए क्षमा मांगता हूं और उसी तरह सभी जीवों से मेरे प्रति जो अपराध हो गए हैं उनके लिए मैं उन्हें क्षमा प्रदान करता हूं।

अस्तेय: जो पराई वस्तुओं पर बुरी नजर रखता हैं वह कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। अत: दूसरों की वस्तुओं पर नजर नहीं रखनी चाहिए।

दया: जिसके हृदय में दया नहीं उसे मनुष्य का जीवन व्यर्थ हैं। हमें सभी प्राणियों के दयाभाव रखना चाहिए। आप अहिंसा का पालन करना चाहते हैं तो आपके मन में दया होनी चाहिए।

छुआछूत: सभी मनुष्य एक समान है। कोई बड़ा-छोटा और छूत-अछूत नहीं हैं। सभी के अंदर एक ही परमात्मा निवास करता है। सभी आत्मा एक सी ही है।

हिताहार और मिताहार: खाना स्वाद के लिए नहीं, अपितु स्वास्थ्य के लिए होना चाहिए। खाना उतना ही खाए जितना जीवित रहने के लिए पर्याप्त हो। खान-पान में अनियमितता हमारे स्वास्थ्य के खिलवाड़ है जिससे हम रोगी हो सकते हैं।

16 संस्कारों में लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र

हिंदू धर्म में किए जाने वाले 16 संस्कार केवल कर्मकांड या रस्में नहीं हैं। इनमें जीवन प्रबंधन के कई सूत्र छुपे हैं। आज के भागदौड़ भरे जीवन में ये सूत्र हमें जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों विकास को आगे बढ़ाते हैं। हमें इन संस्कारों में खुद के वैवाहिक, विद्यार्थी और व्यवसायिक जीवन के सूत्र तो मिलते ही हैं साथ ही अपनी संतान को कैसे संस्कारवान बनाएं इसके तरीके भी मिलते हैं।



पुंसवन संस्कार : इस संस्कार के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह समझाया जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से परिपक्व यानि पूर्ण समर्थ हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान उत्पन्न करें।
नामकरण संस्कार: बालक का नाम सिर्फ उसकी पहचान के लिए ही नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर नामकरण संस्कार किया जाता है।
चूड़ाकर्म संस्कार: (मुण्डन, शिखा स्थापना) सामान्य अर्थ में, माता के गर्भ से सिर पर आए वालों को हटाकर खोपड़ी की सफाई करना आवश्यक होता है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नवजात शिशु के व्यवस्थित बौद्धिक विकास, कुविचारों के परिस्कार के लिये भी यह संस्कार बहुत आवश्यक है।
अन्नप्राशसन संस्कार: जब शिशु के दांत उगने लगें, तो मानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। स्थूल (अन्नमयकोष) के विकास के लिए तो अन्न के विज्ञान सम्मत उपयोग को ध्यान में रखकर शिशु के भोजन का निर्धारण किया जाता है। इन्हीं तमाम बातों को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण संस्कार संपन्न किया जाता है।
विद्यारंभ संस्कार: जब बालक/ बालिका की उम्र शिक्षा ग्रहण करने लायक हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है । इसमें समारोह के माध्यम से जहां एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वहीं ज्ञान के मार्ग का साधक बनाकर अंत में आत्मज्ञान की और प्रेरित किया जाता है।
यज्ञोपवीत संस्कार :
जब बालक/ बालिका का शारीरिक-मानसिक विकास इस योग्य हो जाए कि वह अपने विकास के लिए आत्मनिर्भर होकर संकल्प एवं प्रयास करने लगे, तब उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक एवं सामाजिक अनुशासनों का पालन करने की जिम्मेदारी सोंपी जाती है।
विवाह संस्कार : सफल गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक सामथ्र्य आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। यह संस्कार जीवन का बहुत महत्वपूर्ण संस्कार है जो एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।
वानप्रस्थ संस्कार : गृहस्थ की जिम्मेदारियां यथा शीघ्र संपन्न करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देना ही इस संस्कार का उद्देश्य है।
अन्येष्टि संस्कार : मृत्यु जीवन का एक अटल सत्य है । इसे जरा-जीर्ण को नवीन-स्फूर्तिवान जीवन में रूपान्तरित करने वाला महान देवता भी कह सकते हैं ।
मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार): मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है । शरीर की समाप्ति के बाद भी जीवन की यात्रा रुकती नहीं है । आगे का क्रम भी अच्छी तरह सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणोत्तर संस्कार किया जाता है।
जन्म दिवस संस्कार : मनुष्य को अन्यान्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है । जन्मदिन वह पावन पर्व है, जिस दिन ईश्वर ने हमें श्रेष्ठतम मनुष्य जीवन में भेजा। श्रेष्ठ जीवन प्रदान करने के लिये ईश्वर का धन्यवाद एवं जीवन का सदुपयोग करने का संकल्प ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है।
विवाह दिवस संस्कार : जैसे जीवन का प्रांरभ जन्म से होता है, वैसे ही परिवार का प्रारंभ विवाह से होता है। श्रेष्ठ परिवार और उस माध्यम से श्रेष्ठ समाज बनाने का शुभ प्रयोग विवाह संस्कार से प्रारंभ होता है।

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