शनिवार, 21 नवंबर 2009

चेचक को शीतला माता क्यों कहते हैं?

चेचक के उपचार हेतु वैज्ञानिक एवं डॉक्टरों ने बहुत बल दिया। इसका इलाज औषधियों से ही हो सकता है, किन्तु वे पूर्णत: सफल नहीं हुए। क्योंकि जिस प्रकार कपड़ों में लगी मैल को साबुन धो सकता है किन्तु काई को नहीं छुड़ा पाता है।
यदि कोई मूर्ख तेजाब से कपड़े की काई को निकालने का प्रयास करता है तो परिणाम स्वरूप कपड़ा ही नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार यदि कोई डॉक्टर अपनी दवाओं द्वारा किसी चेचक के रोगी का इलाज करता है तो वह रोगी के जीवन के साथ मजाक करता है। चेचक का रोग शरीर के अंदरूनी भाग से पूरे शरीर पर एक साथ प्रकट होता हे।
ब्राम्ही, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी एवम चामुण्डा ये सात माताएं हैं। इनमें चामुण्डा का स्वरूप सबसे घातक होता है। सात स्टेज वाले इस रोग में प्रथम स्टेज की देवी ब्राम्ही है। चौथे स्टेज तक कोई खतरा नहीं रहता है अर्थात चौथे स्टेज तक जातक के प्राण जाने का खतरा नहीं होता है लेकिन इसके बाद जीवन खतरे में पड़ जाता है।
कौमारी में एक बार विस्फोट होता है, जो नाभि तक दिखाई देता है। वाराही का आक्रमण मंद गति से होता है। अत: इसे मन्थज्वर भी कहते हैं तथा चामुण्डा के आक्रमण से रोगी की दुर्गति हो जाती है। जीभ, आँख, नाक, मुंह पर पूरा प्रकोप होता है। चामुण्डा से आक्रान्त रोगी शव के समान हो जाता है। गधे पर सवार हाथ में झाडू लिए हुए नग्न रूप धारी शीतला माता को हमारा नमस्कार।

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